अरूण उवाच

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Tuesday, March 23, 2004

निसर्ग से उपदेश

बहते पानी की खनखनाहट में
कहता है यह झरना
जल्दी संभल जा पगले
देर हो जायेगी वरना ||

खिलते हुए रंगो से
समझाते है ये फूल
मत उलझो दुनिया के रंगो में
कौन है तू यह मत भूल ||

प्रवाहित वायु की संथ लहरें
गुनगुनाती हैं कानों में
भज पल हर हरी नाम तू
क्या रखा है गंगा स्नानो में ||

सूरज की चमकती किरणें
ले आती हैं यह संदेश
निशा की गहराई में भी
छिपा है यही उपदेश ||

भक्तो के तत्व मसी की
यही है आर्त पुकार
ज्ञानियों के अहं ब्रम्हास्मी में
बसी है यही झंकार ||

सृष्टी के सभी अंगो का
यह एकमात्र कहना
जगा प्रभु मिलन की ज्योती
वरना, यहीं है बार बार मरना ||

प्रतिभाशाली

होता मैं इतना प्रतिभाशाली
तो बन जाता मैं भी कवि
लिखता सुदंर कविता
देखता जो न देखे रवि ||

होता मै इतना प्रतिभाशाली
तो बन जाता मै चित्रकार
खेलता रंगो से रंगोली
दिखाता निसर्ग के आकार ||

होता मै इतना प्रतिभाशाली
बजाता मै फिर बाँसुरी वीणा
छेडता सुरों के सरगम
गाता सुरों का कहना ||

होता मै इतना प्रतिभाशाली
तो बन जाता मैं अभिनेता
अप्सराओं को बाहों मे लेके
कहता मै तुमसे प्यार करता ||

किंतु ना मै कवि, ना चित्रकार
न छेडूँ सुर, न करू प्यार
कम्पयूटर की दुनिया में
रह गया मै बस पैसों का यार ||