अरूण उवाच

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Monday, May 24, 2004

नदी का मनोगत

कृत युग से कली युग तक
युगों युगों से बहती हुँ
जितनी भी सदियाँ बिती बिचमे
फिर भी प्रवाहीत रहती हूँ

आंधी आए आए तूफान
निश्चल रहना धर्म मेरा
कितने भी संकट आए पगमे
चलते रहना कर्म मेरा

ग्रीष्म ऋतु की गर्मी से
सूख जाए मेरी जलधारा भी
दुःख है यह पलभर का जानू
वर्षा को तो है आना ही

मानव निर्मित सेतु
आजमाए मुझपे अपना बल
धीरज फिर भी रखती हूँ
थम जाना है बस कुछ और पल

मार्ग में सुंदर दृष्यों से
न होती हूँ मै मोहित
न रातोंके अंधेरो में
होती हूँ मै भयभीत

और किस चीज की चाह न मुझको
बस मुझको है इतना कहना
सागर मिलन की आस है
मुझको है बहते रहना

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