अरूण उवाच

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Tuesday, December 28, 2004

अकेलापन

मैं भी कभी सुखी था
जब मै अकेला था
पर इस अकेलेपन के सुख से
अति अपरिचित भी था ॥

ऐसा लगता था कि
जीवन मे आयेगा काफी रंग
जब हो जायेगा
किसी हमसफर का संग ॥

एक जीवनसाथी की खोज में
खोया खोया सा रहता था
अपनी ही कल्पनाओं से
उसको साकार बनाता था ॥

कभी किसी कल्पना को
कोई रंग रूप से सजाता था
एक कल्पना के भंग होते ही
उसको नया आकार दिलाता था ॥

चलता रहा यह खेल
जब तक मिला न था कोई
अकेलापन मिटते ही
सारी कल्पनायें हो गयी पराई ॥

कितनी विचित्र है
प्रकृति की यह लिला
जिस सुख को ढूढ़ता रहा
वह कभी भी ना मिला ॥

अब कर रहा हूँ खोज
एक अनोखे अकेलेपन की
प्रकृति के नियमों से हटकर
अद्दभूत कल्पनाओं की
जो कभी ना हो सके भंग
ऐसे निराकार साथी की
जिसके साथ भी पा सकूं
अकेलेपन के सुख को
ऐसे एक विरोधाभास की ॥

२५ दिसंबर २००४