अरूण उवाच

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Tuesday, December 28, 2004

अकेलापन

मैं भी कभी सुखी था
जब मै अकेला था
पर इस अकेलेपन के सुख से
अति अपरिचित भी था ॥

ऐसा लगता था कि
जीवन मे आयेगा काफी रंग
जब हो जायेगा
किसी हमसफर का संग ॥

एक जीवनसाथी की खोज में
खोया खोया सा रहता था
अपनी ही कल्पनाओं से
उसको साकार बनाता था ॥

कभी किसी कल्पना को
कोई रंग रूप से सजाता था
एक कल्पना के भंग होते ही
उसको नया आकार दिलाता था ॥

चलता रहा यह खेल
जब तक मिला न था कोई
अकेलापन मिटते ही
सारी कल्पनायें हो गयी पराई ॥

कितनी विचित्र है
प्रकृति की यह लिला
जिस सुख को ढूढ़ता रहा
वह कभी भी ना मिला ॥

अब कर रहा हूँ खोज
एक अनोखे अकेलेपन की
प्रकृति के नियमों से हटकर
अद्दभूत कल्पनाओं की
जो कभी ना हो सके भंग
ऐसे निराकार साथी की
जिसके साथ भी पा सकूं
अकेलेपन के सुख को
ऐसे एक विरोधाभास की ॥

२५ दिसंबर २००४

5 Comments:

At 3:49 AM, Blogger Debashish said...

निराकार साथी तो "मन" ही हो सकता है। साथी के सामिप्य में भी कई बार एकांत कि चाह होती है, हरेक के जीवन में अपना एक व्यक्तिगत कोना तो होता ही है। यदि हमसफर यह समझ लें, तो साथ और एकांत की चाह दोनों पूरी हो सकती हैं।

 
At 2:39 AM, Blogger प्रेम पीयूष said...

आज किसी को दोस्त कहने पर डर लगता है कि ठगा न जाऊँ । हिम्मत बटोरकर दोस्त कह रहा हूँ, बधंनो से परे , हिन्दी के प्रेम में बंधने हेतु । शुभकामनाओं सहित ।

एक ,
प्रेम.

 
At 5:15 AM, Blogger deepshikha70 said...

bahut sundar likha hai arun ji...i wish ki aapki khoj puri ho....nirakar na sahi..sakar hi mile....lekin ek sacha dost jaroor mile

regards

deepa

 
At 4:40 AM, Anonymous Manoj said...

aisa lag raha hai jasi koi maray man ki baat hi kaha raha ho. we all need space in our relationships. Bhida mai akaila honai ka alag anand hai.

 
At 11:30 PM, Anonymous ફેશન ફોટોગ્રાફર said...

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