अकेलापन
मैं भी कभी सुखी था
जब मै अकेला था
पर इस अकेलेपन के सुख से
अति अपरिचित भी था ॥
ऐसा लगता था कि
जीवन मे आयेगा काफी रंग
जब हो जायेगा
किसी हमसफर का संग ॥
एक जीवनसाथी की खोज में
खोया खोया सा रहता था
अपनी ही कल्पनाओं से
उसको साकार बनाता था ॥
कभी किसी कल्पना को
कोई रंग रूप से सजाता था
एक कल्पना के भंग होते ही
उसको नया आकार दिलाता था ॥
चलता रहा यह खेल
जब तक मिला न था कोई
अकेलापन मिटते ही
सारी कल्पनायें हो गयी पराई ॥
कितनी विचित्र है
प्रकृति की यह लिला
जिस सुख को ढूढ़ता रहा
वह कभी भी ना मिला ॥
अब कर रहा हूँ खोज
एक अनोखे अकेलेपन की
प्रकृति के नियमों से हटकर
अद्दभूत कल्पनाओं की
जो कभी ना हो सके भंग
ऐसे निराकार साथी की
जिसके साथ भी पा सकूं
अकेलेपन के सुख को
ऐसे एक विरोधाभास की ॥
२५ दिसंबर २००४

4 Comments:
निराकार साथी तो "मन" ही हो सकता है। साथी के सामिप्य में भी कई बार एकांत कि चाह होती है, हरेक के जीवन में अपना एक व्यक्तिगत कोना तो होता ही है। यदि हमसफर यह समझ लें, तो साथ और एकांत की चाह दोनों पूरी हो सकती हैं।
आज किसी को दोस्त कहने पर डर लगता है कि ठगा न जाऊँ । हिम्मत बटोरकर दोस्त कह रहा हूँ, बधंनो से परे , हिन्दी के प्रेम में बंधने हेतु । शुभकामनाओं सहित ।
एक ,
प्रेम.
bahut sundar likha hai arun ji...i wish ki aapki khoj puri ho....nirakar na sahi..sakar hi mile....lekin ek sacha dost jaroor mile
regards
deepa
aisa lag raha hai jasi koi maray man ki baat hi kaha raha ho. we all need space in our relationships. Bhida mai akaila honai ka alag anand hai.
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