अरूण उवाच

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Monday, March 14, 2005

प्रार्थना

प्रार्थना में कर दूँ
स्तुति तेरी
इतनी अगाध नही है
मति मेरी ॥

देख सकूँ तेरी दिव्यता को
या माँप सकूँ तेरी विशालता को
इतनी प्रगाढ़ नही है
क्षमता भी मेरी ॥

नही है ऐसे कर्ण मेरे पास
जो सुन सके तेरे ॐकार का अखंड नाद
या नही है ऐसी जिव्हा भी मेरी
जो चख सके तेरे अमृत का स्वाद ॥

इतना तो जान ही लूँ
कि नही है तू कोई लालची राजा
और मै तेरा दरबारी
जो अपनी खुशामदी सुन के
भर देगा झोली मेरी ॥

यही है आरजू चरणो में तेरे
यही है मेरी पुकार
हटा दे सारे विकारों को
गिरा दे मेरा अहंकार ॥

तिरोहीत कर दे मेरे मै को
और हटा दे मेरी मूढ़ता
ताकि देख सकूँ मेरी
असमर्थता के पीछे छिपी क्षुद्रता ॥

कृपा करो ऐसी
कि यह क्षुद्रता का ज्ञान बने मेरा रथ
बने मेरी सच्ची प्रार्थना
और दिखा दे मुझे अपना पथ ॥

Friday, March 11, 2005

अभिप्सा

यह मेरा स्वल्प सा जीवन
रंगीन, सुगंधित, आह्लादित
सूरज की सुनहरी किरणों से
अभी अभी हुआ विकसित ॥

ले आया है नये उमंग
भरा है नयी आशाओंसे
अपने ही मन में दबी
अप्रकट इच्छाओं से ॥

चाहता तो हूँ
कि बन जाऊँ प्रभु के गले का हार
या चढ़ जाऊँ उसके चरणों में
और कर दूँ किसी की पूजा साकार ॥

या कर दूँ सुशोभित
किसी सुंदरी के घुंघराले बाल
या बन जाऊँ
किसी गुलद्स्ते की शान ॥

अपने ही रंगों से कर दूँ
किसी तितली को आकर्षित
या किसी भ्रमर की गुंजन सुनकर
कर दूँ उसे अपना खजाना अर्पित ॥

चाहता तो हूँ हवा के झोंकों पर
दिन भर नृत्य करना
उसी की संथ लहरों पर
अपने परागकण लुटाना ॥

कभी कभी होता हूँ चिंतित मगर
ऐसी डरावनी कल्पनाओं से
मेरी अप्रकट इच्छाओं से विपरीत
ऐसी किसी संभावानाओं से ॥

यह भी हो सकता है
कि चढ़ जाना पडे किसी मृत शरीर पर
या रह जाना पडे
किसी कब्र पर विराजमान होकर ॥

या बनना पडे
किसी दुष्ट राजनेता के गले का हार
या गिरना पडे सूखकर
पौंधे तले निराधार ॥

फिर चलता है मन में द्वंद्व
क्या उचित है ऐसी अप्रकट इच्छाओं को पालना
या डरावनी कल्पनाओं से बिना कारण ही मुरझाना
यह तो नही है धर्म मेरा
कि सोचूं, कौन है भोक्ता
मेरे सौंदर्य या सुगंध का
बल्कि सोचूं कि कैसे निरासक्त होकर
वितरण करूं अपने परिमल का ॥

४ मार्च २००५