प्रार्थना
प्रार्थना में कर दूँ
स्तुति तेरी
इतनी अगाध नही है
मति मेरी ॥
देख सकूँ तेरी दिव्यता को
या माँप सकूँ तेरी विशालता को
इतनी प्रगाढ़ नही है
क्षमता भी मेरी ॥
नही है ऐसे कर्ण मेरे पास
जो सुन सके तेरे ॐकार का अखंड नाद
या नही है ऐसी जिव्हा भी मेरी
जो चख सके तेरे अमृत का स्वाद ॥
इतना तो जान ही लूँ
कि नही है तू कोई लालची राजा
और मै तेरा दरबारी
जो अपनी खुशामदी सुन के
भर देगा झोली मेरी ॥
यही है आरजू चरणो में तेरे
यही है मेरी पुकार
हटा दे सारे विकारों को
गिरा दे मेरा अहंकार ॥
तिरोहीत कर दे मेरे मै को
और हटा दे मेरी मूढ़ता
ताकि देख सकूँ मेरी
असमर्थता के पीछे छिपी क्षुद्रता ॥
कृपा करो ऐसी
कि यह क्षुद्रता का ज्ञान बने मेरा रथ
बने मेरी सच्ची प्रार्थना
और दिखा दे मुझे अपना पथ ॥

5 Comments:
अन्तिम छन्द बहुत सारगर्भित लगा ।
सुन्दर!
really meaningful....
regards,
deepa
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hi.wikipedia.org
शुरुआती पंक्तियाँ अपने बहुत करीब लगीं
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