अरूण उवाच

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Monday, March 14, 2005

प्रार्थना

प्रार्थना में कर दूँ
स्तुति तेरी
इतनी अगाध नही है
मति मेरी ॥

देख सकूँ तेरी दिव्यता को
या माँप सकूँ तेरी विशालता को
इतनी प्रगाढ़ नही है
क्षमता भी मेरी ॥

नही है ऐसे कर्ण मेरे पास
जो सुन सके तेरे ॐकार का अखंड नाद
या नही है ऐसी जिव्हा भी मेरी
जो चख सके तेरे अमृत का स्वाद ॥

इतना तो जान ही लूँ
कि नही है तू कोई लालची राजा
और मै तेरा दरबारी
जो अपनी खुशामदी सुन के
भर देगा झोली मेरी ॥

यही है आरजू चरणो में तेरे
यही है मेरी पुकार
हटा दे सारे विकारों को
गिरा दे मेरा अहंकार ॥

तिरोहीत कर दे मेरे मै को
और हटा दे मेरी मूढ़ता
ताकि देख सकूँ मेरी
असमर्थता के पीछे छिपी क्षुद्रता ॥

कृपा करो ऐसी
कि यह क्षुद्रता का ज्ञान बने मेरा रथ
बने मेरी सच्ची प्रार्थना
और दिखा दे मुझे अपना पथ ॥

6 Comments:

At 7:52 AM, Blogger अनुनाद सिंह said...

अन्तिम छन्द बहुत सारगर्भित लगा ।

 
At 8:44 PM, Blogger Vijay Thakur said...

सुन्दर!

 
At 5:07 AM, Blogger deepshikha70 said...

really meaningful....
regards,
deepa

 
At 7:49 PM, Anonymous Anonymous said...

विकिपीडिया हिन्दी में योगदान करना न भूलें
hi.wikipedia.org

 
At 7:46 AM, Blogger Pratyaksha said...

शुरुआती पंक्तियाँ अपने बहुत करीब लगीं

 
At 11:29 PM, Anonymous ਫ਼ੈਸ਼ਨ ਫੋਟੋਗਰਾਫ਼ਰ said...

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