अरूण उवाच

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Tuesday, August 23, 2005

आशा

कल सुबह सूरज फिर निकलेगा
सुनहरी किरणों से फिर छायेगा
नयी चेतना ले आयेगा
नये रहस्य खोल जायेगा ॥

नये संदेशों से भरकर
फिर नयी हवाएं लहरायेगी
वृक्षों के पर्णों से बहकर
नया संगीत गुनगुनायेगी ॥

पंछियों के नये कुजन से
बसंत ॠतु सा मौसम होगा
नये फूलों के सुगंध से भरा
आल्हादित सा वातावरण होगा ॥

नये उमंगों से भरकर, नयी आशाओं को लेकर
घने मेघ फिर लौट आयेंगे
एक नयी स्फूर्तिली वर्षा से
नये जीवन को जीवन देंगे ॥

आज के सूर्यास्त पर
जीवन का यह क्रम नही रुकेगा
कल सुबह सूरज फिर निकलेगा
सुनहरी किरणों से फिर छायेगा ॥

२३ अगस्त २००५

Sunday, August 21, 2005

निर्लिप्त

किसी पेड से गिरा पत्ता
हवा के झोकों पर लहराता
कभी जाये पूरब तो कभी पश्चिम
कभी देखे आकाश तो कभी नीचे जमीन ॥

न उसे अपनी कोई आशा
जो कर भी सके कभी निराश
जिसके टूट जानेसे
मन हो सके उदास ॥

न है याद उसे
वृक्षपर लटकते हुए क्षणों की
न सताये चिंता
क्षण प्रतिक्षण समीप आते मौत की ॥

आकाश को छूनेकी उमंगों से
भरा हुआ था कभी मन
सूरजकी किरणों और हवाओं के साथ
किया था नृत्य भी हर क्षण ॥

अब एक है विश्राम ऐसा
जिसका न कोई आयाम
हर प्रकार के झंझावात
से मिला है पूर्ण विराम ॥

सोचता हूँ निरंतर
क्या मै भी कभी इस पर्ण के भांति बन सकूँ
अतीत और भविष्य के वृक्ष से टूटकर
वर्तमान में प्रविष्ठ हो सकूँ
खोल कर चित्त विरहितता के महाद्वार को
उस महाप्रकाश को देख सकूँ
जो खडा है दरवाजे पर दस्तक देते
आने दूँ उसे अपने भीतर
और स्वयं फिर एक उसी का अँश बन सकूँ ॥

२१ अगस्त २००५