निर्लिप्त
किसी पेड से गिरा पत्ता
हवा के झोकों पर लहराता
कभी जाये पूरब तो कभी पश्चिम
कभी देखे आकाश तो कभी नीचे जमीन ॥
न उसे अपनी कोई आशा
जो कर भी सके कभी निराश
जिसके टूट जानेसे
मन हो सके उदास ॥
न है याद उसे
वृक्षपर लटकते हुए क्षणों की
न सताये चिंता
क्षण प्रतिक्षण समीप आते मौत की ॥
आकाश को छूनेकी उमंगों से
भरा हुआ था कभी मन
सूरजकी किरणों और हवाओं के साथ
किया था नृत्य भी हर क्षण ॥
अब एक है विश्राम ऐसा
जिसका न कोई आयाम
हर प्रकार के झंझावात
से मिला है पूर्ण विराम ॥
सोचता हूँ निरंतर
क्या मै भी कभी इस पर्ण के भांति बन सकूँ
अतीत और भविष्य के वृक्ष से टूटकर
वर्तमान में प्रविष्ठ हो सकूँ
खोल कर चित्त विरहितता के महाद्वार को
उस महाप्रकाश को देख सकूँ
जो खडा है दरवाजे पर दस्तक देते
आने दूँ उसे अपने भीतर
और स्वयं फिर एक उसी का अँश बन सकूँ ॥
२१ अगस्त २००५

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