tag:blogger.com,1999:blog-66621652007-10-26T05:10:03.568-04:00अरूण उवाचArun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.comBlogger9125tag:blogger.com,1999:blog-6662165.post-1125076401783273192005-08-23T13:10:00.000-04:002005-08-26T13:16:19.196-04:00आशाकल सुबह सूरज फिर निकलेगा<br />सुनहरी किरणों से फिर छायेगा<br />नयी चेतना ले आयेगा<br />नये रहस्य खोल जायेगा ॥<br /><br />नये संदेशों से भरकर<br />फिर नयी हवाएं लहरायेगी<br />वृक्षों के पर्णों से बहकर<br />नया संगीत गुनगुनायेगी ॥<br /><br />पंछियों के नये कुजन से<br />बसंत ॠतु सा मौसम होगा<br />नये फूलों के सुगंध से भरा<br />आल्हादित सा वातावरण होगा ॥<br /><br />नये उमंगों से भरकर, नयी आशाओं को लेकर<br />घने मेघ फिर लौट आयेंगे<br />एक नयी स्फूर्तिली वर्षा से<br />नये जीवन को जीवन देंगे ॥<br /><br />आज के सूर्यास्त पर<br />जीवन का यह क्रम नही रुकेगा<br />कल सुबह सूरज फिर निकलेगा<br />सुनहरी किरणों से फिर छायेगा ॥<br /><br />२३ अगस्त २००५Arun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6662165.post-1125076217738992302005-08-21T13:06:00.000-04:002005-08-26T13:15:02.843-04:00निर्लिप्त<span style="font-family:verdana;">किसी पेड से गिरा पत्ता </span><br /><span style="font-family:verdana;">हवा के झोकों पर लहराता </span><br /><span style="font-family:verdana;">कभी जाये पूरब तो कभी पश्चिम </span><br /><span style="font-family:verdana;">कभी देखे आकाश तो कभी नीचे जमीन ॥<br /></span><br /><span style="font-family:verdana;">न उसे अपनी कोई आशा </span><br /><span style="font-family:verdana;">जो कर भी सके कभी निराश </span><br /><span style="font-family:verdana;">जिसके टूट जानेसे </span><br /><span style="font-family:verdana;">मन हो सके उदास ॥<br /></span><br /><span style="font-family:verdana;">न है याद उसे </span><br /><span style="font-family:verdana;">वृक्षपर लटकते हुए क्षणों की </span><br /><span style="font-family:verdana;">न सताये चिंता </span><br /><span style="font-family:verdana;">क्षण प्रतिक्षण समीप आते मौत की ॥<br /></span><br /><span style="font-family:verdana;">आकाश को छूनेकी उमंगों से </span><br /><span style="font-family:verdana;">भरा हुआ था कभी मन </span><br /><span style="font-family:verdana;">सूरजकी किरणों और हवाओं के साथ </span><br /><span style="font-family:verdana;">किया था नृत्य भी हर क्षण ॥<br /></span><br /><span style="font-family:verdana;">अब एक है विश्राम ऐसा </span><br /><span style="font-family:verdana;">जिसका न कोई आयाम </span><br /><span style="font-family:verdana;">हर प्रकार के झंझावात </span><br /><span style="font-family:verdana;">से मिला है पूर्ण विराम ॥<br /></span><br /><span style="font-family:verdana;">सोचता हूँ निरंतर </span><br /><span style="font-family:verdana;">क्या मै भी कभी इस पर्ण के भांति बन सकूँ </span><br /><span style="font-family:verdana;">अतीत और भविष्य के वृक्ष से टूटकर </span><br /><span style="font-family:verdana;">वर्तमान में प्रविष्ठ हो सकूँ </span><br /><span style="font-family:verdana;">खोल कर चित्त विरहितता के महाद्वार को </span><br /><span style="font-family:verdana;">उस महाप्रकाश को देख सकूँ </span><br /><span style="font-family:verdana;">जो खडा है दरवाजे पर दस्तक देते </span><br /><span style="font-family:verdana;">आने दूँ उसे अपने भीतर </span><br /><span style="font-family:verdana;">और स्वयं फिर एक उसी का अँश बन सकूँ ॥<br /></span><br /><span style="font-family:verdana;">२१ अगस्त २००५</span>Arun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6662165.post-1110827462792240902005-03-14T14:09:00.000-05:002005-03-14T14:11:02.793-05:00प्रार्थनाप्रार्थना में कर दूँ<br />स्तुति तेरी<br />इतनी अगाध नही है<br />मति मेरी ॥<br /><br />देख सकूँ तेरी दिव्यता को<br />या माँप सकूँ तेरी विशालता को<br />इतनी प्रगाढ़ नही है<br />क्षमता भी मेरी ॥<br /><br />नही है ऐसे कर्ण मेरे पास<br />जो सुन सके तेरे ॐकार का अखंड नाद<br />या नही है ऐसी जिव्हा भी मेरी<br />जो चख सके तेरे अमृत का स्वाद ॥<br /><br />इतना तो जान ही लूँ<br />कि नही है तू कोई लालची राजा<br />और मै तेरा दरबारी<br />जो अपनी खुशामदी सुन के<br />भर देगा झोली मेरी ॥<br /><br />यही है आरजू चरणो में तेरे<br />यही है मेरी पुकार<br />हटा दे सारे विकारों को<br />गिरा दे मेरा अहंकार ॥<br /><br />तिरोहीत कर दे मेरे मै को<br />और हटा दे मेरी मूढ़ता<br />ताकि देख सकूँ मेरी<br />असमर्थता के पीछे छिपी क्षुद्रता ॥<br /><br />कृपा करो ऐसी<br />कि यह क्षुद्रता का ज्ञान बने मेरा रथ<br />बने मेरी सच्ची प्रार्थना<br />और दिखा दे मुझे अपना पथ ॥Arun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6662165.post-1110576026111963692005-03-11T16:18:00.000-05:002005-03-11T16:20:26.113-05:00अभिप्सायह मेरा स्वल्प सा जीवन<br />रंगीन, सुगंधित, आह्लादित<br />सूरज की सुनहरी किरणों से<br />अभी अभी हुआ विकसित ॥<br /><br />ले आया है नये उमंग<br />भरा है नयी आशाओंसे<br />अपने ही मन में दबी<br />अप्रकट इच्छाओं से ॥<br /><br />चाहता तो हूँ<br />कि बन जाऊँ प्रभु के गले का हार<br />या चढ़ जाऊँ उसके चरणों में<br />और कर दूँ किसी की पूजा साकार ॥<br /><br />या कर दूँ सुशोभित<br />किसी सुंदरी के घुंघराले बाल<br />या बन जाऊँ<br />किसी गुलद्स्ते की शान ॥<br /><br />अपने ही रंगों से कर दूँ<br />किसी तितली को आकर्षित<br />या किसी भ्रमर की गुंजन सुनकर<br />कर दूँ उसे अपना खजाना अर्पित ॥<br /><br />चाहता तो हूँ हवा के झोंकों पर<br />दिन भर नृत्य करना<br />उसी की संथ लहरों पर<br />अपने परागकण लुटाना ॥<br /><br />कभी कभी होता हूँ चिंतित मगर<br />ऐसी डरावनी कल्पनाओं से<br />मेरी अप्रकट इच्छाओं से विपरीत<br />ऐसी किसी संभावानाओं से ॥<br /><br />यह भी हो सकता है<br />कि चढ़ जाना पडे किसी मृत शरीर पर<br />या रह जाना पडे<br />किसी कब्र पर विराजमान होकर ॥<br /><br />या बनना पडे<br />किसी दुष्ट राजनेता के गले का हार<br />या गिरना पडे सूखकर<br />पौंधे तले निराधार ॥<br /><br />फिर चलता है मन में द्वंद्व<br />क्या उचित है ऐसी अप्रकट इच्छाओं को पालना<br />या डरावनी कल्पनाओं से बिना कारण ही मुरझाना<br />यह तो नही है धर्म मेरा<br />कि सोचूं, कौन है भोक्ता<br />मेरे सौंदर्य या सुगंध का<br />बल्कि सोचूं कि कैसे निरासक्त होकर<br />वितरण करूं अपने परिमल का ॥<br /><br />४ मार्च २००५Arun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6662165.post-1104260179234622842004-12-28T13:52:00.000-05:002004-12-28T13:56:19.233-05:00अकेलापनमैं भी कभी सुखी था
<br />जब मै अकेला था
<br />पर इस अकेलेपन के सुख से
<br />अति अपरिचित भी था ॥
<br />
<br />ऐसा लगता था कि
<br />जीवन मे आयेगा काफी रंग
<br />जब हो जायेगा
<br />किसी हमसफर का संग ॥
<br />
<br />एक जीवनसाथी की खोज में
<br />खोया खोया सा रहता था
<br />अपनी ही कल्पनाओं से
<br />उसको साकार बनाता था ॥
<br />
<br />कभी किसी कल्पना को
<br />कोई रंग रूप से सजाता था
<br />एक कल्पना के भंग होते ही
<br />उसको नया आकार दिलाता था ॥
<br />
<br />चलता रहा यह खेल
<br />जब तक मिला न था कोई
<br />अकेलापन मिटते ही
<br />सारी कल्पनायें हो गयी पराई ॥
<br />
<br />कितनी विचित्र है
<br />प्रकृति की यह लिला
<br />जिस सुख को ढूढ़ता रहा
<br />वह कभी भी ना मिला ॥
<br />
<br />अब कर रहा हूँ खोज
<br />एक अनोखे अकेलेपन की
<br />प्रकृति के नियमों से हटकर
<br />अद्दभूत कल्पनाओं की
<br />जो कभी ना हो सके भंग
<br />ऐसे निराकार साथी की
<br />जिसके साथ भी पा सकूं
<br />अकेलेपन के सुख को
<br />ऐसे एक विरोधाभास की ॥
<br />
<br />२५ दिसंबर २००४
<br />Arun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6662165.post-1095610946157976982004-09-19T13:20:00.000-04:002004-09-21T08:58:32.723-04:00संतुष्टजो मेरे लिए योग्य
<br />वह सब कुछ तूने मुझे दे दिया
<br />जो कर सकता था मै धारण
<br />वही मैने पा लिया ॥
<br />फिर भी करता रहा तकरार उसके बारेमे
<br />जो मुझे मिल न सका
<br />लेकिन यही सच है कि दीया था तुने मुझे सब कुछ
<br />मगर मै काफी कुछ पा न सका ॥
<br />१९ सितंबर २००४
<br />Arun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6662165.post-1085429389644326762004-05-24T16:07:00.000-04:002004-05-25T08:24:06.763-04:00नदी का मनोगतकृत युग से कली युग तक
<br />युगों युगों से बहती हुँ
<br />जितनी भी सदियाँ बिती बिचमे
<br />फिर भी प्रवाहीत रहती हूँ
<br />
<br />आंधी आए आए तूफान
<br />निश्चल रहना धर्म मेरा
<br />कितने भी संकट आए पगमे
<br />चलते रहना कर्म मेरा
<br />
<br />ग्रीष्म ऋतु की गर्मी से
<br />सूख जाए मेरी जलधारा भी
<br />दुःख है यह पलभर का जानू
<br />वर्षा को तो है आना ही
<br />
<br />मानव निर्मित सेतु
<br />आजमाए मुझपे अपना बल
<br />धीरज फिर भी रखती हूँ
<br />थम जाना है बस कुछ और पल
<br />
<br />मार्ग में सुंदर दृष्यों से
<br />न होती हूँ मै मोहित
<br />न रातोंके अंधेरो में
<br />होती हूँ मै भयभीत
<br />
<br />और किस चीज की चाह न मुझको
<br />बस मुझको है इतना कहना
<br />सागर मिलन की आस है
<br />मुझको है बहते रहनाArun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6662165.post-1080060390115827032004-03-23T11:46:00.000-05:002004-05-24T16:13:40.106-04:00निसर्ग से उपदेशबहते पानी की खनखनाहट में
<br />कहता है यह झरना
<br />जल्दी संभल जा पगले
<br />देर हो जायेगी वरना ||
<br />
<br />खिलते हुए रंगो से
<br />समझाते है ये फूल
<br />मत उलझो दुनिया के रंगो में
<br />कौन है तू यह मत भूल ||
<br />
<br />प्रवाहित वायु की संथ लहरें
<br />गुनगुनाती हैं कानों में
<br />भज पल हर हरी नाम तू
<br />क्या रखा है गंगा स्नानो में ||
<br />
<br />सूरज की चमकती किरणें
<br />ले आती हैं यह संदेश
<br />निशा की गहराई में भी
<br />छिपा है यही उपदेश ||
<br />
<br />भक्तो के तत्व मसी की
<br />यही है आर्त पुकार
<br />ज्ञानियों के अहं ब्रम्हास्मी में
<br />बसी है यही झंकार ||
<br />
<br />सृष्टी के सभी अंगो का
<br />यह एकमात्र कहना
<br />जगा प्रभु मिलन की ज्योती
<br />वरना, यहीं है बार बार मरना ||Arun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6662165.post-1080055427714828722004-03-23T10:23:00.000-05:002004-05-24T16:15:35.356-04:00प्रतिभाशालीहोता मैं इतना प्रतिभाशाली
<br />तो बन जाता मैं भी कवि
<br />लिखता सुदंर कविता
<br />देखता जो न देखे रवि ||
<br />
<br />होता मै इतना प्रतिभाशाली
<br />तो बन जाता मै चित्रकार
<br />खेलता रंगो से रंगोली
<br />दिखाता निसर्ग के आकार ||
<br />
<br />होता मै इतना प्रतिभाशाली
<br />बजाता मै फिर बाँसुरी वीणा
<br />छेडता सुरों के सरगम
<br />गाता सुरों का कहना ||
<br />
<br />होता मै इतना प्रतिभाशाली
<br />तो बन जाता मैं अभिनेता
<br />अप्सराओं को बाहों मे लेके
<br />कहता मै तुमसे प्यार करता ||
<br />
<br />किंतु ना मै कवि, ना चित्रकार
<br />न छेडूँ सुर, न करू प्यार
<br />कम्पयूटर की दुनिया में
<br />रह गया मै बस पैसों का यार ||
<br />Arun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.com