tag:blogger.com,1999:blog-6662165.post-1085429389644326762004-05-24T16:07:00.000-04:002004-05-25T08:24:06.763-04:00नदी का मनोगतकृत युग से कली युग तक
<br />युगों युगों से बहती हुँ
<br />जितनी भी सदियाँ बिती बिचमे
<br />फिर भी प्रवाहीत रहती हूँ
<br />
<br />आंधी आए आए तूफान
<br />निश्चल रहना धर्म मेरा
<br />कितने भी संकट आए पगमे
<br />चलते रहना कर्म मेरा
<br />
<br />ग्रीष्म ऋतु की गर्मी से
<br />सूख जाए मेरी जलधारा भी
<br />दुःख है यह पलभर का जानू
<br />वर्षा को तो है आना ही
<br />
<br />मानव निर्मित सेतु
<br />आजमाए मुझपे अपना बल
<br />धीरज फिर भी रखती हूँ
<br />थम जाना है बस कुछ और पल
<br />
<br />मार्ग में सुंदर दृष्यों से
<br />न होती हूँ मै मोहित
<br />न रातोंके अंधेरो में
<br />होती हूँ मै भयभीत
<br />
<br />और किस चीज की चाह न मुझको
<br />बस मुझको है इतना कहना
<br />सागर मिलन की आस है
<br />मुझको है बहते रहनाArun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.com