tag:blogger.com,1999:blog-6662165.post-1110576026111963692005-03-11T16:18:00.000-05:002005-03-11T16:20:26.113-05:00अभिप्सायह मेरा स्वल्प सा जीवन<br />रंगीन, सुगंधित, आह्लादित<br />सूरज की सुनहरी किरणों से<br />अभी अभी हुआ विकसित ॥<br /><br />ले आया है नये उमंग<br />भरा है नयी आशाओंसे<br />अपने ही मन में दबी<br />अप्रकट इच्छाओं से ॥<br /><br />चाहता तो हूँ<br />कि बन जाऊँ प्रभु के गले का हार<br />या चढ़ जाऊँ उसके चरणों में<br />और कर दूँ किसी की पूजा साकार ॥<br /><br />या कर दूँ सुशोभित<br />किसी सुंदरी के घुंघराले बाल<br />या बन जाऊँ<br />किसी गुलद्स्ते की शान ॥<br /><br />अपने ही रंगों से कर दूँ<br />किसी तितली को आकर्षित<br />या किसी भ्रमर की गुंजन सुनकर<br />कर दूँ उसे अपना खजाना अर्पित ॥<br /><br />चाहता तो हूँ हवा के झोंकों पर<br />दिन भर नृत्य करना<br />उसी की संथ लहरों पर<br />अपने परागकण लुटाना ॥<br /><br />कभी कभी होता हूँ चिंतित मगर<br />ऐसी डरावनी कल्पनाओं से<br />मेरी अप्रकट इच्छाओं से विपरीत<br />ऐसी किसी संभावानाओं से ॥<br /><br />यह भी हो सकता है<br />कि चढ़ जाना पडे किसी मृत शरीर पर<br />या रह जाना पडे<br />किसी कब्र पर विराजमान होकर ॥<br /><br />या बनना पडे<br />किसी दुष्ट राजनेता के गले का हार<br />या गिरना पडे सूखकर<br />पौंधे तले निराधार ॥<br /><br />फिर चलता है मन में द्वंद्व<br />क्या उचित है ऐसी अप्रकट इच्छाओं को पालना<br />या डरावनी कल्पनाओं से बिना कारण ही मुरझाना<br />यह तो नही है धर्म मेरा<br />कि सोचूं, कौन है भोक्ता<br />मेरे सौंदर्य या सुगंध का<br />बल्कि सोचूं कि कैसे निरासक्त होकर<br />वितरण करूं अपने परिमल का ॥<br /><br />४ मार्च २००५Arun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.com