tag:blogger.com,1999:blog-6662165.post-1110827462792240902005-03-14T14:09:00.000-05:002005-03-14T14:11:02.793-05:00प्रार्थनाप्रार्थना में कर दूँ<br />स्तुति तेरी<br />इतनी अगाध नही है<br />मति मेरी ॥<br /><br />देख सकूँ तेरी दिव्यता को<br />या माँप सकूँ तेरी विशालता को<br />इतनी प्रगाढ़ नही है<br />क्षमता भी मेरी ॥<br /><br />नही है ऐसे कर्ण मेरे पास<br />जो सुन सके तेरे ॐकार का अखंड नाद<br />या नही है ऐसी जिव्हा भी मेरी<br />जो चख सके तेरे अमृत का स्वाद ॥<br /><br />इतना तो जान ही लूँ<br />कि नही है तू कोई लालची राजा<br />और मै तेरा दरबारी<br />जो अपनी खुशामदी सुन के<br />भर देगा झोली मेरी ॥<br /><br />यही है आरजू चरणो में तेरे<br />यही है मेरी पुकार<br />हटा दे सारे विकारों को<br />गिरा दे मेरा अहंकार ॥<br /><br />तिरोहीत कर दे मेरे मै को<br />और हटा दे मेरी मूढ़ता<br />ताकि देख सकूँ मेरी<br />असमर्थता के पीछे छिपी क्षुद्रता ॥<br /><br />कृपा करो ऐसी<br />कि यह क्षुद्रता का ज्ञान बने मेरा रथ<br />बने मेरी सच्ची प्रार्थना<br />और दिखा दे मुझे अपना पथ ॥Arun Kulkarnihttp://www.blogger.com/profile/05235974306032930613noreply@blogger.com